नज़्म

आज भरी महफ़िल में

फ़ैसला तमाम हो जाए

नाम इतना न उछालो मेरा

कि मेरा नाम हो जाए

दिल का कमज़ोर हूँ पर

किसी का दिल तो नहीं दुखाया

दिल पे चोट खाई

और दर्द में भी मुस्कुराया

दीनों के लिए फ़िक्रमंद हूँ

इसीलिए शायद खुदा को पसंद हूँ

किसी की बुराई न की

शायद इसलिए मैं बुरा हूँ

ज़माना मुझ पर उँगलियाँ उठाए

क्या मैं पूरा हूँ

कुछ की मदद की

कुछ की न कर पाया

जिसके मैं लायक़ था

उतना ही कर पाया

माना थोड़ा ग़ैरज़िम्मेदार हूँ

पर तुम्हारे लिए हमेशा तैयार हूँ

लोगों को इंसान की परख नहीं होती

हर चमकती चीज़ पारस नहीं होती

लोग ये सारे भूल गए हैं

मतलब और ख़ुदगर्ज़ी में

रिश्ते नाते धन और दौलत

क्या लेकर जाओगे अर्थी में

जो औरों के काम न आए

वो जीवन बेकार है

ऐसा भी किया आदमी

जिसको खुद से ही प्यार है

कत्ल देख जो मौन खड़े हैं

वो भी ठहरे कातिल हैं

ख़ौफ़नाक से इस जुल्म में

सारे के सारे शामिल हैं

वक्त है बदला तुम भी बदलो

वक़्त नहीं दोहराएगा

जो कुछ किया करा है तुमने

काम तुम्हारे आएगा

ख़ैर मनाऊँ नेक खुदा का

ये एहसान तुम पर हो

हो न वरना मैं मर जाऊँ

और इल्ज़ाम तुम पर हो

हँसी के गुलगुले

एक लोफर की एक लड़की से दोस्ती हो गई। कुछ दिनों बाद लड़की ने whatsapp पर लोफर लड़के को block कर दिया।

लड़का ( कॉल पर): क्या बात है जानू आजकल तुम whatsapp पर दिखाई नहीं दे रही।

लड़की: होता है होता है… जब आशिक़ी का भूत चढ़ता है तो न कुछ दिखाई देता है न सुनाई। ( number block)

लड़का : हेलो, हेलो… ठीक कहा …अब तुम मुझे सुनाई भी नहीं दे रही।😂😂

नज़्म

देख कर दीवार की घड़ी

मैं दफ़्तर को निकल पड़ी

खड़ी थी भीड़-भाड में

बस पर सवार मैं

एक नौजवान ने बड़ी ज़हमत की

उठ खड़े हो मुझे अपनी सीट दी

सामने खुले झरोखे से

सर्द हवा छू गई मुझे धोखे से

बस निकल पड़ी रफ़्तार से

गुजरते एक बाज़ार से

चलते चलते अचानक मेरी नज़र उस चीज़ पर पड़ी

जिसको देख मेरी आँखें रह गईं फटी की फटी

शीशे की आग़ोश में

था एक पुतला दिलकश लिबास में

लिबास का रंग कुछ गाढ़ा था

जैसे सुरमई बादलों का जमावड़ा था

उस पर सीप और मोती थे जड़ें

और फूल कढ़े थे चमकीले सुनहले

ऐसा तो कभी-कभी ही होता है इत्तिफ़ाक़ से

कुछ भा जाता है हमें एक आँख में

पर करती भी क्या करती

थी दफ़्तर पहुँचने की जल्दी

सारा दिन मेरी जान अटकी थी

उस आलीशान दुकान की खिड़की में

सोच कर ऐसा लगता था मानो

उस लिबास को मेरे लिए ही कढ़ा हो

बार-बार निहारूँ मैं घड़ी

जाने कब होगी मेरी तमन्ना पूरी

जैसे गुजरते बादलों के बीच कहकशाँ

लगूँगी मैं आम से अप्सरा

जैसे जैसे घड़ी का काँटा बढ़ने लगा

मेरे सब्र का बांध भी उतरने लगा

जा पहुँची मैं उस दुकान पर

जहाँ पोशाक टंगी थी शान से

दुकान पहुँचकर मुझे हुई हैरत

वो लिबास था दुकान से नदारद

दुकानदार ने दिखाई ऐसी चीजें जिससे सबका सर चकरा जाए

पर कुछ भी ऐसा नहीं जो मेरे मन को भी जाए

मेरे चेहरे पर छाई थी मायूसी

जैसे जंग में हारा एक सिपाही

चल पड़ी मैं घर की ओर पाँव घिसते

एक और आरज़ू रह गई पूरी होने से

अक्सर ज़िन्दगी में हो जाता है ऐसा

हम चाहते हैं जिसे दिलो-जान से, हो जाता है किसी और का

ग़ज़ल

वो आशिक़ी ही क्या जो दिल में रह जाए

अपने इश्क को ज़ाहिर कर के छोड़ो

गर छोड़ने की ज़रूरत आ जाए उनको

तो फिर उनको शायर कर के छोड़ो

क़ानून ऐसा आए दिल जो तोड़ें

उनपर मुक़दमा दायर कर के छोड़ो

बड़ी ही संगदिल दुनिया है ये लोगों

दिल को अपने पत्थर कर के छोड़ो

किसी को जो हराना हो तर्क से तो फिर

तुम उसे तर्क से बाहर कर के छोड़ो