ग़ज़ल

वैसे तो शख़्सियत पढ़ने में

मुझको अब हासिल है माहिरी

पर पढ़ भी नहीं सके हम नादाँ

उनके मन की वो बंद डायरी

इतनी किताबें पढ़ कर भी भला

कहाँ आती है दुनियादारी

तुमसे गुज़ारिश है जानाँ तुम

खोल दो वो मन की बंद खिड़की

इतना दिल में दबा के रखोगे

तो हों जाएँगी मुसीबतें बड़ी

अब तो ये मौन व्रत तोड़ दो

कि आज होगी अंतिम सेहरी

हैपी बर्थडे!

शहर के जाने माने व्यवसायी के बेटे का पाँचवा जन्मदिन था। इस सुअवसर पर उन्होनें कई नामी ग्रामी हस्तियों को दावत पर बुलाया था। जहाँ एक तरफ़ पुरुष जाम छलकाते हुए गुफ़्तगु में तल्लीन थे तो इस मामले में महिलाएँ भी कहीं पीछे नहीं थीं। बच्चों के लिए जादू का आयोजन कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण था। गोलगप्पे और चाट के स्टालों पर विशेष रूप से भारी भीड़ थी। डी जे के गानों पर बच्चे, बूढ़े और व्यस्क थिरकते नज़र आ रहे थे।

मोहल्ले का धोबी रामस्वरूप अपने परिवार संग बाज़ार जा रहा था कि उनकी नज़र उस भव्य आयोजन पर पड़ी। वे बाहर से ही आयोजन का आनंद लेने लगे। रामस्वरूप और उसकी पत्नी बख़ूबी जानते थे कि कार्यक्रम में शामिल होना उसकी क़िस्मत में नहीं था पर उसके चार साल के बेटे को इसकी कहाँ समझ थी; वह कार्यक्रम में शरीक होने की ज़िद कर बैठा)!माँ पिता के लाख बहलाने-फुसलाने पर भी कि वे बाज़ार से

उसके लिए उसके मनपसंद खिलौने ख़रीद देंगे, वह न माना।उसके बाल हट के आगे रामस्वरूप की एक न चल सकी!

राम स्वरूप को एक युक्ति सूझी। उसने अपनी पत्नी से कहा – “साहब और उनके परिवार के इस्तिरी किये हुए कपड़े किस दिन काम आएँगे!

राम स्वरूप की पत्नी ने कहा – अरे यह ग़लती कभी मत करना! यहाँ सारा मोहल्ला हमें पहचानता है।

रामस्वरूप ने अपनी पत्नी की बातों पर जरा भी ध्यान न दिया और सपरिवार सूटेड-बूटेड होकर आयोजन में शरीक होने पहुँच गया।

रामस्वरूप धोबी के बच्चे खेलने में तल्लीन हो गए और रामस्वरूप लोगों से बात करने में और गोलगप्पे-चाट का आनंद लेने लगा।

तभी एक महानुभाव ने उससे गुफ़्तगू करनी शुरू कर दी।

“आपकी शक्ल जानी- पहचानी मालूम होती है… आपकी तारीफ़….वैसे आपका कारोबार किया है?”

“मैं आकाश जिंदल…मैं कपड़े की मिलों का मालिक हूँ और अपने काम के चलते हमेशा सुर्ख़ियों में बना रहता हूँ। आपने शायद अख़बारों में मेरी तस्वीरें देखी होंगी। मशहूर उद्योगपति सूरज जिंदल मेरे भाई हैं।”

“आप पार्टियों में कम शिरकत करते हैं क्या?”

“अपने कारोबार के चलते मैं ज़्यादातर विदेश में ही रहता हूँ।”

तभी सूरज जिंदल पार्टी में आ जाते हैं और जब उन्हें पता चलता है कि उनके कोई भाई भी वहाँ मौजूद हैं तो चकित रह जाते हैं क्योंकि वे अपने माँ-बाप की इकलौती संतान थे। धोबी को देख वह सारा माजरा समझ जाते हैं। स्टेज पर एक कार्यक्रम चल रहा था और सारे मेहमान बैठ कर उसका आनंद ले रहे थे। तभी सूरज जिंदल कार्यक्रम के परिचालक से माइक ले लेते हैं और कहते हैं “ आज हमारे बीच एक ख़ास शख़्सियत मौजूद हैं जिनका नाम है आकाश जिंदल। वे मेरे सगे भाई हैं। मैं चाहूँगा की बड़े भइया जिनके देश- विदेश कारोबार फैले हुए हैं, आपसे आकर अंग्रेज़ी में दो शब्द कहें।”

रामस्वरूप बड़ी दुविधा में पड़ गया। उसे अंग्रेज़ी तो आती न थी।

उसने माइक सँभाला और बोलना शुरू किया- ये सच है कि मैंने आक्सफर्ड से पढ़ाई की है ( आक्सफर्ड नाम का एक नुक्कड़ का स्कूल था जहाँ से वह सातवीं पास था!) पर मैं अपनी मातृ भूमि से, अपनी ज़मीन से जुड़ा हूँ। फिर उसने दो-तीन लाइनें अंग्रेज़ी में भी बोल दी जो उसने अपने बच्चों के मूँह से कभी सुनी थीं। उसने अपने बच्चों को अंग्रेज़ी मीडियम स्कूल में डाल रखा था। दो तीन लाइनों के बाद वह फिर हिन्दी पर उतर आया।

इतने में भीड से आवाज़ आई-“आपने कपड़े तो ब्रांडेड पहन लिए पर जूते बदलना भूल गए क्या…आपके जूते तो फटे हैं।” लोग हँस पड़े।

धोबी घबरा गया पर फिर भी अपनी बात जारी रखी – “मैंने अपनी ज़िन्दगी एक धोबी के रूप में शुरू की थी और आज यहाँ तक पहुँचा हूँ। जूते ज़मीन से जुड़े होते हैं-वे घिसते हैं, रगड़ते हैं, कटते हैं, फटते हैं और हमें मौसम से, पत्थरों आदि से बचाते हैं। ये जूते मुझे अपनी हक़ीक़त की याद दिलाते हैं कि मैं धोबी था और धोबी ही रहूँगा। मेरे ये फटे पुराने जूते मेरे संघर्ष के दिनों की याद ताज़ा करते हैं और आज इन्हीं की बदौलत मैं यहाँ खड़ा हूँ।

सारा माहौल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।

सूरज जिंदल बोले- मेरे भइया दरअसल वो नहीं जो दिखते हैं….( धोबी घबराया…) वे उससे भी कहीं बढ़कर हैं। …इंसान नहीं…… महान है…… ये उद्योगपति नहीं……(धोबी फिर घबराया…) ये भूपति हैं..।

माहौल फिर तालियों के बौछार से गूंज उठा।

धोबी की साँस में साँस आई।

सूरज जिंदल ने रामस्वरूप के कर्ण में फुसफुसाया- “तुझे लगता है विदेशी दारू कुछ ज़्यादा ही चढ़ गई… बड़ा अच्छा बोला और मुझे नहीं पता था कि नुक्कड़ के आक्सफर्ड में इतनी अच्छी अंग्रेज़ी भी सिखाते है!”

वो तारों वाली रात

तुम नहीं थे

फिर तुम यहीं थे

तुमसे रात पहर होती रही बात

याद आती है मुझको वो तारों रात

चाँद नहीं था

पर चाँद कहीं था

स्याह आसमाँ और तारों की बिसात

याद आती है मुझको वो तारों वाली रात

जगमगाते झिलमिल करते सितारे

टूटते गिरते सितारे

रात भर तारों की होती रही बरसात

याद आती है मुझको वो तारों वाली रात

हवा झूमती, चूमती

बेशुमार तारों की गिनती

हर घड़ी चलता रहा हिसाब

याद आती है मुझको वो तारों वाली रात

डोलते मंजर

बोलते झींगुर

स्याह अंबर और खुला छत

याद आती है मुझको वो तारों वाली रात

रात बड़ी

नींद उड़ी-उड़ी

नींद के लग गए पाँख

याद आती है मुझको वो तारों वाली रात

वो दो आँखें भी तो तारा हैं

जाने क्या करती इशारा हैं

जाने क्या है इनकी दरख्वास्त

याद आती है मुझको वो तारों वाली रात

पवन डोले साँय-साँय

मेरे कानों में आकर फुसफुसाएँ

सन्नाटों से आती रही आवाज़

याद आती है……………….रात

बचपन की नींद से दोस्ती हैं

जवानी मुझे कोसती है

माँ आ कर सर पर फेर दे हाथ

याद………..रात

जमाना मुझपर हँसता है

पर मेरा प्यार सच्चा है

यह कम-जर्फ जमाना छोड़ दे दो मेरा साथ

याद आती है…………….

diwali special

कुछ सफ़ाई पसंद लोगों को ये चेतावनी कि नौकरों से दिवाली की सफ़ाई कराते वक़्त इतनी सफ़ाई भी न करा लें कि बटुए, locker सब साफ़ हो जाएँ।

इल्तिजा एक, ढंग जुदा-जुदा

सरपरस्ती में उठे तो इबादत

मंदिर में जुड़े तो पूजा

शुभ दीपावली

joke#

एक पति हर बात पर अपनी पत्नी को पगली कह कर संबोधित करता था। एक दिन पत्नी ने तंग कर कह दियाशादी के 20 साल हो गए है, कुछ तुम्हारा असर भी तो आना ही था।🤣🤣

ग़ज़ल

चली है झूमती पवन ज़रा चहक उठा है मन

ठहर लुभावनी घड़ी में धुन मैं गुनगुना तो लूँ

लो गा रही हैं कोयलें सुना रही नफ़्स नफस

लो सुर में सुर मिला के आज सुन मैं गुनगुना तो लूँ

है याद आ रहा कोई अब उसकी आरज़ू सजा

ये प्यास से भरे नयन को मुन मैं गुनगुना तो लूँ

मुझे तो लग गए हैं पंख छू लूँ ज़मीन आसमाँ

हज़ार से हसीन ख़्वाब बुन मैं गुनगुना तो लूँ

ये पल अगर गुज़र गया तो लौट कर न आएगा

अभी मिला मुझे जो पल को चुन मैं गुनगुना तो लूँ

आदत

पवन रति का दीवाना था। रोज़ कई दफ़ा वह रति की गलियों के चक्कर लगाता था और इस बात का इंतज़ार करता था कि रति बालकनी से झाँके और उसके चाँद से चेहरे का दीदार हो। रति को पवन पसंद था पर वह इसको मानने से कतराती थी पर पवन भी कहाँ हार मानने वाला था। उसने रति को अपना बना के ही छोड़ा। वे दोनों घर वालों से छिप कर मिलने लगे। शुरू के दिनों में वे कम मिलते थे पर धीरे-धीरे उनकी मुलाक़ातों का सिलसिला बढ़ने लगा। रति भी पवन को बेहद चाहने लगी थी। पवन की नौकरी लग गई और वह रति पर कम ध्यान देने लगा। वह सारा दिन अपने काम को ही लेकर उलझा रहता।रति ने पवन का ध्यान अपनी ओर खींचने की कोशिश की पर पवन उससे दूर होता चला गया।रति बहुत रोई। वह पवन के बिना न रह पाती थी। उसने पवन से रिश्ता जोड़े रहने में कोई कसर बाक़ी नहीं छोड़ी पर अफ़सोस। समय के साथ रति ने भी पवन को भुला दिया और उनकी प्रेम कहानी का अंत हो गया।

रति को यह अहसास हुआ कि जिसे वह इश्क समझ बैठी थी, दरअसल वह इश्क नहीं था बल्कि आदत थी। धीरे- धीरे उसे पवन की आदत लग चुकि थी और यह आदत जाते जाते ही जाती है। हम भी अक्सर जिसे प्यार समझ बैठते हैं वह प्यार नहीं बल्कि आदत है।

असली मोहब्बत तो वो है जो चौबे जी को कथ्था, चुना, सुपारी लौंग और तंबाकू वाले बनारसी पान से है। इसकी चाह में वे कितने ही वर्षों से चौरसिया पान वाले के यहाँ चक्कर लगा रहे है। अमूमन लोगों को वह ही होता है जिसे हम अंग्रेज़ी भाषा में “क्रश” कहते हैं। कल राकेश पर थी, आज मोहन पर तो कल विनोद पर होगी।