ग़ज़ल

वैसे तो शख़्सियत पढ़ने में

मुझको अब हासिल है माहिरी

पर पढ़ भी नहीं सके हम नादाँ

उनके मन की वो बंद डायरी

इतनी किताबें पढ़ कर भी भला

कहाँ आती है दुनियादारी

तुमसे गुज़ारिश है जानाँ तुम

खोल दो वो मन की बंद खिड़की

इतना दिल में दबा के रखोगे

तो हों जाएँगी मुसीबतें बड़ी

अब तो ये मौन व्रत तोड़ दो

कि आज होगी अंतिम सेहरी