ग़ज़ल

ये न पूछ तक़दीर में क्या लिखा है

जो मिला बड़े मतलब से मिला है

हमने ताउम्र ख़ैरात बाँटी है

हमसे हर शख़्स मक्सद से मिला है

हमें इसका न कोई रंज-ओ-गिला

जो मिला रब की नेमत से मिला है

उसकी आरजू क्या जो औरों को हासिल

क्या पल पल की शिकायत से मिला है

हमें वो मिला जिसके हम थे क़ाबिल

ये मत पूछ क्या मिला न मिला है

ये कोई करिश्मा या दुआ का असर

फर्द औरों से बेहतर ही मिला है

ग़ज़ल

महफ़िल में ले के नाम मेरा सनम

सबसे कह दो तेरा मैं भी वरना नहीं

तक़दीरों में मैं हूँ लकीरों में तेरी

वरना मोहब्बत मुझको अब करना नहीं

दुनिया क्या कहती है क्या कहेगी भला

दुश्मन इस दुनिया से हमें डरना नहीं

मुजरिम न बन जाऊँ निगाहों में तेरी

ला हासिल इन चक्करों में पड़ना नहीं

लड लड के मैं खुद से भी अब थकने लगा

बेकार में तुमसे मुझे लड़ना नहीं

माला जो बाहों की तुम पहना दो ज़रा

ग़ैरों की बाहों में मुझे मरना नहीं

ग़ज़ल

कुछ ऐसे भी सवालात हुआ करते हैं

जिनके कोई भी जवाब नहीं होते

कम्बख़्त दुनिया अगर सीधी हुआ करती

तो हम भी यकीनन ख़राब नहीं होते

जो ख़्वाब हमारी नींदें न उड़ा दें

वो ख़्वाब भी दोस्तों ख़्वाब नहीं होते

अगर आप हमारी जान न ले लेते तो

फिर हम भी कत्ल जनाब नहीं होते

ये दुनिया अगर तस्कीन से चलती तो

फिर इतने क़ौमी फ़साद नहीं होते

जो पर उँची उड़ानों के मुतासिर हैं

उन परों के कोई हिसाब नहीं होते

हम भी कैसे भला ज़िन्दा रह पाते

अगर ज़िन्दगी में मेरे आप नहीं होते

Ghazal

Boy-

ये दिलकश समा

हैं हमतुम यहाँ

झुकी सी नज़र

पिघलती शमा

हो क्यूँ फ़ासले

भला दर्मियाँ

समझ लो सनम

नयन की ज़ुबान

रुमानी मौसम

का ले लें मजा

मिटा दें सनम

हैं जो दूरियाँ

कहाँ है तेरी

वो कुर्बत वफ़ा

तेरी वो हलफ

वो तेरी रजा

मचलती नफस

वो तेरा वादा

हूँ मदहोश मैं

एक तेरे बिना

Girl-

तू भँवरा छली

मैं खिलती सबा

दिखता है पर

नहीं तू भला

शरारत न कर

मुझे मत बना

हाँ माना तू है

एक मुझपे फिदा

नज़र से मेरी

तू हो जा दफ़ा

तू बनता होगा

नहीं तू मेरा

कभी बन सका

न मेरी वफ़ा

मैं कमसिन बला

तु है मनचला

न सोचो ये तुम

नहीं है पता

मेरा वो होगा

कुछ हटके ज़रा

मंजरी ‘पुष्प’

Boy-

जाते हो ये बता दो

किस नाम पुकारूँ

हक़ जो दे दो मुझको

मैं चाँद पुकारूँ

सच्चा हूँ मैं आशिक

दिल थाम पुकारूँ

खिलती सी सुबह से

फिर शाम पुकारूँ

Girl-

तुमको मैं भी जाना

किस काम पुकारूँ

उलफत में जीता

नाकाम पुकारूँ

राधा मैं हूँ तुमको

क्या श्याम पुकारूँ

खिलती सी सुबह से

फिर शाम पुकारूँ

Ghazal

वैसे तो शख़्सियत पढ़ने में

मुझको अब हासिल है माहिरी

पर पढ़ भी नहीं सके हम नादाँ

उनके मन की वो बंद डायरी

इतनी किताबें पढ़ कर भी भला

कहाँ आती है दुनियादारी

तुमसे गुज़ारिश है जानाँ तुम

खोल दो वो मन की बंद खिड़की

इतना दिल में दबा के रखोगे

तो हों जाएँगी मुसीबतें बड़ी

अब तो ये मौन व्रत तोड़ दो

कि आज होगी अंतिम सेहरी

मंजरी ‘पुष्प’

Ghazal

थी चाँदनी में शब धुली

था चाँद भी शबाब पर

महफ़िल सजी थी तारों की

धुंधले से आसमान पर

मेरी नज़र लगी रही

थी चाँद पर किताब पर

उनकी मचलती याद थी

इस जज़्बाए कलाम पर

यूँ टकटकी लगी रही

आई न नींद रात भर

कोई न ज़ोर चल सका

एहसासों के तूफ़ान पर

तुम्हें सुनाएँ हाले दिल

आके मिलो जो बाम पर

मंजरी ‘पुष्प’

Ghazal

जो ख़त मोहब्बत के लिखे थे तुमने

अब भी महफ़ूज़ रखे हैं सिरहाने से

जब भी मिल जाती है मुझको चंद मोहलत

पढ लेती हूँ मैं उन्हें बहाने से

जो न पढ सकूँ तो लगा लेती हूँ अंदाज

लब्ज जो मिट चुके हैं आँसुओं के पानी से

तेरे ख़तों की क्या बात ये हैं नायाब

तब तीरे- नज़र जाके लगा निशाने पे

ये है मेरी बेचैन निगाहों का सबब

तुम नहीं आए फिर भी मेरे बुलाने से

ख़त जलाना है तो जला दूँ मेरी जाँ

निशाँ तेरे सब मिट जाएँगे ठिकाने से

अब तो नहीं मुझे रुसवाइयों का डर

कौन करता अब फ़िकर बेदर्द जमाने की

सीने में है यार-ए-दश्त-ए-तसव्वुर

हम तो जीते हैं ख़तों के बहाने से

तेरे-मेरे मिलने की नहीं क़िस्मत

फिर भी चूकते नहीं क़िस्मत को आजमाने से

मंजरी ‘पुष्प’

Ghazal

तुम नहीं आसपास दीवारों दर का साथ

करें तो क्या करें हर्फ-ए-सुख़न बयाँ करें

कुछ लिख के फाड़ें फिर कुछ नया लिखा करें

दोस्तों को फिर बेधड़क लिखा सुनाया करें

साल के अंतिम पल में सालगिरह मुबारक

ऐसे में तोहफ़े में क्या बनवाया करें

मैं जन्म से कंगाल नहीं हीरे पोखराज

सोचा नज़्म तुमको अपनी सुनाया करें