रोला छंद

मैं निष्कपट, अबोध,

जान अधिक पाया नहीं।

यह कपटी संसार,

श्री बिन कछु भाया नहीं।


कह के मुकर जाए

कर के बातें जो बड़ी

मैं गाँव की लैला,

न कोई शहरों की परी।


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