ग़ज़ल

वैसे तो शख़्सियत पढ़ने में

मुझको अब हासिल है माहिरी

पर पढ़ भी नहीं सके हम नादाँ

उनके मन की वो बंद डायरी

इतनी किताबें पढ़ कर भी भला

कहाँ आती है दुनियादारी

तुमसे गुज़ारिश है जानाँ तुम

खोल दो वो मन की बंद खिड़की

अपनी दिलकश ज़ुबान पर कयुँ

लगा दी तुमने तालों की पहरी

तुम्हारे यूँ चुप रहने से

वक़्त की क़ज़ा रह जाएँगी ठहरी

इतना दिल में दबा के रखोगे

तो हों जाएँगी मुसीबतें बड़ी

खोल दो दिल के राज वो गहरे

बोल पड़ी है सूनी देहरी

अब तो ये मौन व्रत तोड़ दो

कि आज होगी अंतिम सहरी

ग़ज़ल

वैसे तो शख़्सियत पढ़ने में

मुझको अब हासिल है माहिरी

पर पढ़ भी नहीं सके हम नादाँ

उनके मन की वो बंद डायरी

इतनी किताबें पढ़ कर भी भला

कहाँ आती है दुनियादारी

तुमसे गुज़ारिश है जानाँ तुम

खोल दो वो मन की बंद खिड़की

इतना दिल में दबा के रखोगे

तो हों जाएँगी मुसीबतें बड़ी

अब तो ये मौन व्रत तोड़ दो

कि आज होगी अंतिम सेहरी

ग़ज़ल

चली है झूमती पवन ज़रा चहक उठा है मन

ठहर लुभावनी घड़ी में धुन मैं गुनगुना तो लूँ

लो गा रही हैं कोयलें सुना रही नफ़्स नफस

लो सुर में सुर मिला के आज सुन मैं गुनगुना तो लूँ

है याद आ रहा कोई अब उसकी आरज़ू सजा

ये प्यास से भरे नयन को मुन मैं गुनगुना तो लूँ

मुझे तो लग गए हैं पंख छू लूँ ज़मीन आसमाँ

हज़ार से हसीन ख़्वाब बुन मैं गुनगुना तो लूँ

ये पल अगर गुज़र गया तो लौट कर न आएगा

अभी मिला मुझे जो पल को चुन मैं गुनगुना तो लूँ

ग़ज़ल

हम दुआँ ये करें तुम मिलो हर जनम

संग बीते जो पल हमको लगते हैं कम

इल्तिजा में तेरी तेरे सर की क़सम

डोर मन्नत की कल जोड़ आए हैं हम

हम को पाने के भी कर लो कोई जतन

हो न मेरे वचन पड़ भी जाएँ न कम

डर कोई भी नहीं इस कड़ी के सिवा

हमसे बढ़ के तुम्हें माँग लेगा सनम

कोई जो छीन कर ले गया गर तुम्हें

जानेमन हम यहीं तोड़ दें अपना दम

ग़ज़ल

कुछ ऐसे भी सवालात हुआ करते हैं

जिनके कोई भी जवाब नहीं होते

कम्बख़्त दुनिया अगर सीधी हुआ करती

तो हम भी यकीनन ख़राब नहीं होते

जो ख़्वाब हमारी नींदें न उड़ा दें

वो ख़्वाब भी दोस्तों ख़्वाब नहीं होते

अगर आप हमारी जान न ले लेते तो

फिर हम भी कत्ल जनाब नहीं होते

ये दुनिया अगर तस्कीन से चलती तो

फिर इतने क़ौमी फ़साद नहीं होते

जो पर उँची उड़ानों के मुतासिर हैं

उन परों के कोई हिसाब नहीं होते

हम भी कैसे भला ज़िन्दा रह पाते

अगर ज़िन्दगी में मेरे आप नहीं होते

ग़ज़ल

टक्कर हुई सड़क पे तो

दिल के वो तार हिल गए

दरिया में थे बुझे पड़े

कँवल वो सारे खिल गए

बदले जो रंग नूर के

ख़तों के सिलसिले चल गए

बदल गए मिज़ाजे मन

लहजे पूरे बदल गए

धड़कन में उनकी बस गए

वो दिल में ढल गए

ग़ज़ल

वो आशिक़ी ही क्या जो दिल में रह जाए

अपने इश्क को ज़ाहिर कर के छोड़ो

गर छोड़ने की ज़रूरत आ जाए उनको

तो फिर उनको शायर कर के छोड़ो

क़ानून ऐसा आए दिल जो तोड़ें

उनपर मुक़दमा दायर कर के छोड़ो

बड़ी ही संगदिल दुनिया है ये लोगों

दिल को अपने पत्थर कर के छोड़ो

किसी को जो हराना हो तर्क से तो फिर

तुम उसे तर्क से बाहर कर के छोड़ो

ग़ज़ल

जो ख़त मोहब्बत के लिखे थे तुमने

अब भी महफ़ूज़ रखे हैं सिरहाने से

जब भी मिल जाती है मुझको चंद मोहलत

पढ लेती हूँ मैं उन्हें बहाने से

जो न पढ सकूँ तो लगा लेती हूँ अंदाज

लब्ज जो मिट चुके हैं आँसुओं के पानी से

तेरे ख़तों की क्या बात ये हैं नायाब

तब तीरे- नज़र जाके लगा निशाने पे

ये है मेरी बेचैन निगाहों का सबब

तुम नहीं आए फिर भी मेरे बुलाने से

ख़त जलाना है तो जला दूँ मेरी जाँ

निशाँ तेरे सब मिट जाएँगे ठिकाने से

अब तो नहीं मुझे रुसवाइयों का डर

कौन करता अब फ़िकर बेदर्द जमाने की

सीने में है यार-ए-दश्त-ए-तसव्वुर

हम तो जीते हैं ख़तों के बहाने से

तेरे-मेरे मिलने की नहीं क़िस्मत

हम चूकते नहीं क़िस्मत को आजमाने से

Ghazal

आपके प्यार में दिल दिवाना हुआ

इस गली में तेरा जब से आना हुआ

सोजे उल्फत की राहों में गुमनाम था

अब तो महफ़ूज़ उसका ठिकाना हुआ

तुम मिले हमनबां तो लगा यूँ हमें

पंछियों का नए सुर में गाना हुआ

जो घंटा मेह बन के बरसता न था

बे मौसम बारिशों का जमाना हुआ

फ़र्ज़ इतना जो मुझपे इनायत करम

सर इबादत में उसके झुकाना हुआ

मेरा कुछ भी नहीं मुझमें बाक़ी रहा

मेरा अब तो सभी कुछ तुम्हारा हुआ

Ghazal

लोग जो भी गुज़र जाएँ ठहर के देखें

गर दुनिया तुम्हें मेरी नज़र से देखे

जिस गली में भी बसा है आशियाँ तेरा

लोग राहें सब उसी डगर के देखें

तेरे वजूद से हैं ये रातें रौशन

रात अंधेरों को सहर कर के देखें

यू चाहत में दिए जाने की ज़िद में

सोचा अपनी लंबी उम्र कर के देखें

नूर में तेरे जब है दवाओं सा असर

क्यूँ वो रस्ते चारागर के देखें

सूरत से चल जाता है सीरत का पता

चाह बाक़ी तेरे दिल में उतर के देखें