नज़्म

गुज़रे कल में औरत ने सँभाला घर

आज दोनों घर और दफ़्तर

दो पाटों के बीच में वो देखो

बँट गई आधी-आधी है

दुनिया वालों तुम ही बतलाओ

ये कैसी आज़ादी है

पिता ने जो डाक्टर-इंजीनियर बनने

का सपना दिखलाया था

पति बोलता माँ- बाप ने

तुमको आख़िर क्या सिखलाया है

आज़ाद मर्द है औरत के तो

सपनों पर भी पाबंदी है

दुनिया वालों तुम ही बतलाओ

ये कैसी आज़ादी है

इल्म और तालीम से

वो तुमसे कदम से कदम मिलाती है

न जाने क्यों वो कदम

चलते हुए कहीं रुक जाती है

वो सूने रास्तों पर चलने से घबराती है

दुनिया वालों………..

……………….. आज़ादी है

नारी सशक्तिकरण के सारे दावे

यहाँ बेमानी हैं

ऐसा लगता है मानो ये

कोई व्यवस्था तालिबानी है

आज भी मातम छा जाता है

जब घर पैदा होती बेटी है

दुनिया वालों……………

…………….. आज़ादी है

नज़्म

संदली सी शाम को

हम साथ कॉफी पीया करते थे

जब से तुम गए हो

मैंने कॉफी पीना छोड़ दिया

रोज़ संग छत पर

बैडमिंटन खेला करते थे

जब से तुम चले गए

मैंने रैकेट तोड़ दिया

एक बुरी आदत छूट गई

एक अच्छे को छोड दिया

सन्नाटा चारों ओर है लेकिन

फिर न जाने अंदर कैसा शोर हुआ

जो मेरा था वो सब मुझसे

एक एक कर के दूर हुआ

जो ग़लत मेरे साथ हुआ

उसका जवाबदेह बतलाओ कौन हुआ

नज़्म

आज भरी महफ़िल में

फ़ैसला तमाम हो जाए

नाम इतना न उछालो मेरा

कि मेरा नाम हो जाए

दिल का कमज़ोर हूँ पर

किसी का दिल तो नहीं दुखाया

दिल पे चोट खाई

और दर्द में भी मुस्कुराया

दीनों के लिए फ़िक्रमंद हूँ

इसीलिए शायद खुदा को पसंद हूँ

किसी की बुराई न की

शायद इसलिए मैं बुरा हूँ

ज़माना मुझ पर उँगलियाँ उठाए

क्या मैं पूरा हूँ

कुछ की मदद की

कुछ की न कर पाया

जिसके मैं लायक़ था

उतना ही कर पाया

माना थोड़ा ग़ैरज़िम्मेदार हूँ

पर तुम्हारे लिए हमेशा तैयार हूँ

लोगों को इंसान की परख नहीं होती

हर चमकती चीज़ पारस नहीं होती

लोग ये सारे भूल गए हैं

मतलब और ख़ुदगर्ज़ी में

रिश्ते नाते धन और दौलत

क्या लेकर जाओगे अर्थी में

जो औरों के काम न आए

वो जीवन बेकार है

ऐसा भी किया आदमी

जिसको खुद से ही प्यार है

कत्ल देख जो मौन खड़े हैं

वो भी ठहरे कातिल हैं

ख़ौफ़नाक से इस जुल्म में

सारे के सारे शामिल हैं

वक्त है बदला तुम भी बदलो

वक़्त नहीं दोहराएगा

जो कुछ किया करा है तुमने

काम तुम्हारे आएगा

ख़ैर मनाऊँ नेक खुदा का

ये एहसान तुम पर हो

हो न वरना मैं मर जाऊँ

और इल्ज़ाम तुम पर हो

नज़्म

देख कर दीवार की घड़ी

मैं दफ़्तर को निकल पड़ी

खड़ी थी भीड़-भाड में

बस पर सवार मैं

एक नौजवान ने बड़ी ज़हमत की

उठ खड़े हो मुझे अपनी सीट दी

सामने खुले झरोखे से

सर्द हवा छू गई मुझे धोखे से

बस निकल पड़ी रफ़्तार से

गुजरते एक बाज़ार से

चलते चलते अचानक मेरी नज़र उस चीज़ पर पड़ी

जिसको देख मेरी आँखें रह गईं फटी की फटी

शीशे की आग़ोश में

था एक पुतला दिलकश लिबास में

लिबास का रंग कुछ गाढ़ा था

जैसे सुरमई बादलों का जमावड़ा था

उस पर सीप और मोती थे जड़ें

और फूल कढ़े थे चमकीले सुनहले

ऐसा तो कभी-कभी ही होता है इत्तिफ़ाक़ से

कुछ भा जाता है हमें एक आँख में

पर करती भी क्या करती

थी दफ़्तर पहुँचने की जल्दी

सारा दिन मेरी जान अटकी थी

उस आलीशान दुकान की खिड़की में

सोच कर ऐसा लगता था मानो

उस लिबास को मेरे लिए ही कढ़ा हो

बार-बार निहारूँ मैं घड़ी

जाने कब होगी मेरी तमन्ना पूरी

जैसे गुजरते बादलों के बीच कहकशाँ

लगूँगी मैं आम से अप्सरा

जैसे जैसे घड़ी का काँटा बढ़ने लगा

मेरे सब्र का बांध भी उतरने लगा

जा पहुँची मैं उस दुकान पर

जहाँ पोशाक टंगी थी शान से

दुकान पहुँचकर मुझे हुई हैरत

वो लिबास था दुकान से नदारद

दुकानदार ने दिखाई ऐसी चीजें जिससे सबका सर चकरा जाए

पर कुछ भी ऐसा नहीं जो मेरे मन को भी जाए

मेरे चेहरे पर छाई थी मायूसी

जैसे जंग में हारा एक सिपाही

चल पड़ी मैं घर की ओर पाँव घिसते

एक और आरज़ू रह गई पूरी होने से

अक्सर ज़िन्दगी में हो जाता है ऐसा

हम चाहते हैं जिसे दिलो-जान से, हो जाता है किसी और का

कुछ नहीं बचा

सुना है किसी की औलाद गुज़र गई

कुछ ही पल में उसकी कायनात उजड़ गई

सुना है किसी का दामाद गुज़र गया

नई-नवेली उस दुल्हन का सुहाग उजड़ गया

किसी ने वो खोया जो कमाता था रोज़ी- रोटी

किसी ने बाप खोया तो किसी ने बेटी

इस मर्ज ने न अमीरी देखी न फ़क़ीरी

लोगों ने तड़प तड़प कर साँस तोड़ी

न इसने बूढ़ा देखा न जवान

हर एक को बनाया अपना निशाँ

इस मर्ज ने ढाया है क़हर ग़ज़ब

न तेरा मुल्क देखा न मेरा मज़हब

किसी को दवा नहीं मिल रही किसी को साँसें

हर तरफ़ कब्र खुदें है हर तरफ़ जल रही लाशें

नदी में लावारिस लाशें तैरती

आह भरती चीखती पुकारती

कहीं खुल न जाए नेताओं की पोल

बीमारी की जाँचे और आँकड़े हुए गोल

गौर करना जितना होगा तन पर कपड़ा उजला

उतना ही होगा मन मैला

ये नेता करते बातों से चोट पर चोट

इन्हें समझ आता है सिर्फ़ नोट और वोट

सुना है उस की भी निकली मय्यत

जो मर्ज की देता था औरों को नसीहत

जब उसका इल्म और तजुर्बा न बचा सकी उसकी जान

तो हम नाचीज़ फिर होते हैं कौन

हाथों से रेत सी फिसलती ज़िंदगी

बेपरवाह चलते एक मोड़ पर थम सी गई

Nazm

चादर

जब पहाड़ों पर बिछती है बर्फ़ की चादर सी

तब तन से आ लिपटती है गर्म चादर सी

कि न रही अब लाज की फ़िकर भी

ऐसी होती है अहसास उस नर्म चादर की

जब कोई चादर किसी गद्दे पर है जा पड़ती

तब लगती है बिसात उसकी संगेमरमर सी

जब बदलती है वो उसपर करवट सी

तब पड़ती है उसपर रेश्मी सिलवट सी

जब रखती है तकिये पर वो सर अपनी

तब लगती है उसकी ज़ुल्फ़ बादल सी

सोई रहती है वो अंजान बेख़बर सी

न परवाह उसे किसी आहट-सरसराहट की

जब आसमानों पर चाँदनी जाती है बिखर सी

तब याद आती है ग़ज़ल किसी शायर की

शान में क्या कहें उस मक़बूल पेंटर की

जिसने तराशा ये मुकम्मल समा उसके हुनर की

जब चादर ख्वाजा के दर पर है जा पड़ती

तो जैद की तक़दीर जाती है सँवर सी

तब खुल जाती हैं किवाड़ें जन्नत की

और होती है मुराद पूरी धागा-ए-मन्नत भी

Nazm

मुँडेर पर बैठी एक मैना

न जाने क्या चाहती है वो कहना

है बेचैन वो बिलकुल अकेली

नहीं साथ कोई सखा-सहेली

अचानक कहीं से पा गई वो एक तिनका

जिन्हें जोड़ बनाएगी वो घोंसला अपने मनका