मोढा

हिन्दी कविता

साहब को जब दफ़्तर जाना हो

तो जूते पहनने के काम आता यह मोढा,

बड़ी ही मुफ़ीद चीज़ है

मेमसाहब के श्रृंगार के दौरान यह मोढा;


काम आ जाए पंखों की सफ़ाई में,

यह बच्चों का भी बड़ा सगा भाई है।

फिर चाहे रखी हो कोई चीज़ ताख पर,

औरतें दरीचे से आवाजाही देखती झाँककर!


हो अगर किसी के स्थानांतरण की ख़बर,

नहीं रहता इसके टूटने-फूटने का डर।

वज़न में भी है बिलकुल हल्का-फुल्का,

सोफ़े की शान है पर यह मोढा है काम का;


नमक की तरह है, चीज़ों के अस्तित्व में घोल दे स्वाद,

बनना है तो इसके जैसा बनो, यह मोढा है लाजवाब!

पर बच्चों संभलकर करना इसकी चढ़ाई,

हड्डी-पसली एक होगी अगर क़दम लड़खड़ाई!

मंजरी

Manjari Narayan

दर्द भरी शायरी

गजल

ये जानती हूँ मैं सनम तुम्हें भी प्यार है सही

सनम ये बात और है कहा नहीं कभी मगर

जमाने की सदा-सदा मुझपे उठी हैं उँगलियाँ

यूँ बेरुख़ी से अब तेरी हो जाँए हम रुसवा अगर

सदा तेरी तलाश में फिरा किया इधर-उधर

मिला मुझे यहीं इधर ढूँढा जिसे नगर-नगर

कई मुक़ाम बाक़ी भी अभी फ़तह हैं करने को

रक़ीब साथ दो मेरा हो मेरी भी आँसा डगर

उठ जाएगा यक़ीन भी जमाने का इमाम से

यूँ बेरुख़ी से भी तेरी हाँ मर गया जो मैं अगर

कविता

भारत माँ का तनिक भी

होगा ना नुक़सान

सरहद पर फ़ौजी डँटे,

चौडी छाती तान।

भारत माँ के पूत हैं,

लाल, बाल औ पाल।

सभी करें यश गान मिल,

दे कर सौ-सौ ताल।

रोला छंद

मैं निष्कपट, अबोध,

जान अधिक पाया नहीं।

यह कपटी संसार,

श्री बिन कछु भाया नहीं।


कह के मुकर जाए

कर के बातें जो बड़ी

मैं गाँव की लैला,

न कोई शहरों की परी।


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