ग़ज़ल

टक्कर हुई सड़क पे तो

दिल के वो तार हिल गए

दरिया में थे बुझे पड़े

कँवल वो सारे खिल गए

बदले जो रंग नूर के

ख़तों के सिलसिले चल गए

बदल गए मिज़ाजे मन

लहजे पूरे बदल गए

धड़कन में उनकी बस गए

वो दिल में ढल गए

ग़ज़ल

जो ख़त मोहब्बत के लिखे थे तुमने

अब भी महफ़ूज़ रखे हैं सिरहाने से

जब भी मिल जाती है मुझको चंद मोहलत

पढ लेती हूँ मैं उन्हें बहाने से

जो न पढ सकूँ तो लगा लेती हूँ अंदाज

लब्ज जो मिट चुके हैं आँसुओं के पानी से

तेरे ख़तों की क्या बात ये हैं नायाब

तब तीरे- नज़र जाके लगा निशाने पे

ये है मेरी बेचैन निगाहों का सबब

तुम नहीं आए फिर भी मेरे बुलाने से

ख़त जलाना है तो जला दूँ मेरी जाँ

निशाँ तेरे सब मिट जाएँगे ठिकाने से

अब तो नहीं मुझे रुसवाइयों का डर

कौन करता अब फ़िकर बेदर्द जमाने की

सीने में है यार-ए-दश्त-ए-तसव्वुर

हम तो जीते हैं ख़तों के बहाने से

तेरे-मेरे मिलने की नहीं क़िस्मत

हम चूकते नहीं क़िस्मत को आजमाने से

Ghazal

जो ख़त मोहब्बत के लिखे थे तुमने

अब भी महफ़ूज़ रखे हैं सिरहाने से

जब भी मिल जाती है मुझको चंद मोहलत

पढ लेती हूँ मैं उन्हें बहाने से

जो न पढ सकूँ तो लगा लेती हूँ अंदाज

लब्ज जो मिट चुके हैं आँसुओं के पानी से

तेरे ख़तों की क्या बात ये हैं नायाब

तब तीरे- नज़र जाके लगा निशाने पे

ये है मेरी बेचैन निगाहों का सबब

तुम नहीं आए फिर भी मेरे बुलाने से

ख़त जलाना है तो जला दूँ मेरी जाँ

निशाँ तेरे सब मिट जाएँगे ठिकाने से

अब तो नहीं मुझे रुसवाइयों का डर

कौन करता अब फ़िकर बेदर्द जमाने की

सीने में है यार-ए-दश्त-ए-तसव्वुर

हम तो जीते हैं ख़तों के बहाने से

तेरे-मेरे मिलने की नहीं क़िस्मत

फिर भी चूकते नहीं क़िस्मत को आजमाने से

मंजरी ‘पुष्प’