ग़ज़ल

चली है झूमती पवन ज़रा चहक उठा है मन

ठहर लुभावनी घड़ी में धुन मैं गुनगुना तो लूँ

लो गा रही हैं कोयलें सुना रही नफ़्स नफस

लो सुर में सुर मिला के आज सुन मैं गुनगुना तो लूँ

है याद आ रहा कोई अब उसकी आरज़ू सजा

ये प्यास से भरे नयन को मुन मैं गुनगुना तो लूँ

मुझे तो लग गए हैं पंख छू लूँ ज़मीन आसमाँ

हज़ार से हसीन ख़्वाब बुन मैं गुनगुना तो लूँ

ये पल अगर गुज़र गया तो लौट कर न आएगा

अभी मिला मुझे जो पल को चुन मैं गुनगुना तो लूँ

ग़ज़ल

कुछ ऐसे भी सवालात हुआ करते हैं

जिनके कोई भी जवाब नहीं होते

कम्बख़्त दुनिया अगर सीधी हुआ करती

तो हम भी यकीनन ख़राब नहीं होते

जो ख़्वाब हमारी नींदें न उड़ा दें

वो ख़्वाब भी दोस्तों ख़्वाब नहीं होते

अगर आप हमारी जान न ले लेते तो

फिर हम भी कत्ल जनाब नहीं होते

ये दुनिया अगर तस्कीन से चलती तो

फिर इतने क़ौमी फ़साद नहीं होते

जो पर उँची उड़ानों के मुतासिर हैं

उन परों के कोई हिसाब नहीं होते

हम भी कैसे भला ज़िन्दा रह पाते

अगर ज़िन्दगी में मेरे आप नहीं होते