ग़ज़ल

चली है झूमती पवन ज़रा चहक उठा है मन

ठहर लुभावनी घड़ी में धुन मैं गुनगुना तो लूँ

लो गा रही हैं कोयलें सुना रही नफ़्स नफस

लो सुर में सुर मिला के आज सुन मैं गुनगुना तो लूँ

है याद आ रहा कोई अब उसकी आरज़ू सजा

ये प्यास से भरे नयन को मुन मैं गुनगुना तो लूँ

मुझे तो लग गए हैं पंख छू लूँ ज़मीन आसमाँ

हज़ार से हसीन ख़्वाब बुन मैं गुनगुना तो लूँ

ये पल अगर गुज़र गया तो लौट कर न आएगा

अभी मिला मुझे जो पल को चुन मैं गुनगुना तो लूँ

ग़ज़ल

ये न पूछ तक़दीर में क्या लिखा है

जो मिला बड़े मतलब से मिला है

हमने ताउम्र ख़ैरात बाँटी है

हमसे हर शख़्स मक्सद से मिला है

हमें इसका न कोई रंज-ओ-गिला

जो मिला रब की नेमत से मिला है

उसकी आरजू क्या जो औरों को हासिल

क्या पल पल की शिकायत से मिला है

हमें वो मिला जिसके हम थे क़ाबिल

ये मत पूछ क्या मिला न मिला है

ये कोई करिश्मा या दुआ का असर

फर्द औरों से बेहतर ही मिला है

ग़ज़ल

महफ़िल में ले के नाम मेरा सनम

सबसे कह दो तेरा मैं भी वरना नहीं

तक़दीरों में मैं हूँ लकीरों में तेरी

वरना मोहब्बत मुझको अब करना नहीं

दुनिया क्या कहती है क्या कहेगी भला

दुश्मन इस दुनिया से हमें डरना नहीं

मुजरिम न बन जाऊँ निगाहों में तेरी

ला हासिल इन चक्करों में पड़ना नहीं

लड लड के मैं खुद से भी अब थकने लगा

बेकार में तुमसे मुझे लड़ना नहीं

माला जो बाहों की तुम पहना दो ज़रा

ग़ैरों की बाहों में मुझे मरना नहीं

ग़ज़ल

कुछ ऐसे भी सवालात हुआ करते हैं

जिनके कोई भी जवाब नहीं होते

कम्बख़्त दुनिया अगर सीधी हुआ करती

तो हम भी यकीनन ख़राब नहीं होते

जो ख़्वाब हमारी नींदें न उड़ा दें

वो ख़्वाब भी दोस्तों ख़्वाब नहीं होते

अगर आप हमारी जान न ले लेते तो

फिर हम भी कत्ल जनाब नहीं होते

ये दुनिया अगर तस्कीन से चलती तो

फिर इतने क़ौमी फ़साद नहीं होते

जो पर उँची उड़ानों के मुतासिर हैं

उन परों के कोई हिसाब नहीं होते

हम भी कैसे भला ज़िन्दा रह पाते

अगर ज़िन्दगी में मेरे आप नहीं होते

ग़ज़ल

टक्कर हुई सड़क पे तो

दिल के वो तार हिल गए

दरिया में थे बुझे पड़े

कँवल वो सारे खिल गए

बदले जो रंग नूर के

ख़तों के सिलसिले चल गए

बदल गए मिज़ाजे मन

लहजे पूरे बदल गए

धड़कन में उनकी बस गए

वो दिल में ढल गए