नज़्म

संदली सी शाम को

हम साथ कॉफी पीया करते थे

जब से तुम गए हो

मैंने कॉफी पीना छोड़ दिया

रोज़ संग छत पर

बैडमिंटन खेला करते थे

जब से तुम चले गए

मैंने रैकेट तोड़ दिया

एक बुरी आदत छूट गई

एक अच्छे को छोड दिया

सन्नाटा चारों ओर है लेकिन

फिर न जाने अंदर कैसा शोर हुआ

जो मेरा था वो सब मुझसे

एक एक कर के दूर हुआ

जो ग़लत मेरे साथ हुआ

उसका जवाबदेह बतलाओ कौन हुआ

ग़ज़ल

वो आशिक़ी ही क्या जो दिल में रह जाए

अपने इश्क को ज़ाहिर कर के छोड़ो

गर छोड़ने की ज़रूरत आ जाए उनको

तो फिर उनको शायर कर के छोड़ो

क़ानून ऐसा आए दिल जो तोड़ें

उनपर मुक़दमा दायर कर के छोड़ो

बड़ी ही संगदिल दुनिया है ये लोगों

दिल को अपने पत्थर कर के छोड़ो

किसी को जो हराना हो तर्क से तो फिर

तुम उसे तर्क से बाहर कर के छोड़ो

Ghazal

जो ख़त मोहब्बत के लिखे थे तुमने

अब भी महफ़ूज़ रखे हैं सिरहाने से

जब भी मिल जाती है मुझको चंद मोहलत

पढ लेती हूँ मैं उन्हें बहाने से

जो न पढ सकूँ तो लगा लेती हूँ अंदाज

लब्ज जो मिट चुके हैं आँसुओं के पानी से

तेरे ख़तों की क्या बात ये हैं नायाब

तब तीरे- नज़र जाके लगा निशाने पे

ये है मेरी बेचैन निगाहों का सबब

तुम नहीं आए फिर भी मेरे बुलाने से

ख़त जलाना है तो जला दूँ मेरी जाँ

निशाँ तेरे सब मिट जाएँगे ठिकाने से

अब तो नहीं मुझे रुसवाइयों का डर

कौन करता अब फ़िकर बेदर्द जमाने की

सीने में है यार-ए-दश्त-ए-तसव्वुर

हम तो जीते हैं ख़तों के बहाने से

तेरे-मेरे मिलने की नहीं क़िस्मत

फिर भी चूकते नहीं क़िस्मत को आजमाने से

मंजरी ‘पुष्प’