ग़ज़ल

ये जानती हूँ मैं सनम तुम्हें भी प्यार है सही

सनम ये बात और है कहा नहीं कभी मगर

जमाने की सदा-सदा मुझपे उठी हैं उँगलियाँ

यूँ बेरुख़ी से अब तेरी हो जाँए हम रुसवा अगर

सदा तेरी तलाश में फिरा किया इधर-उधर

मिला मुझे मन में बसर ढूँढा जिसे नगर-नगर

कई मुक़ाम बाक़ी भी अभी फ़तह हैं करने को

रक़ीब साथ दो मेरा हो मेरी भी आँसा डगर

उठ जाएगा यक़ीन भी जमाने का इमाम से

यूँ बेरुख़ी से भी तेरी हाँ मर गया जो मैं अगर

ग़ज़ल

वैसे तो शख़्सियत पढ़ने में

मुझको अब हासिल है माहिरी

पर पढ़ भी नहीं सके हम नादाँ

उनके मन की वो बंद डायरी

इतनी किताबें पढ़ कर भी भला

कहाँ आती है दुनियादारी

तुमसे गुज़ारिश है जानाँ तुम

खोल दो वो मन की बंद खिड़की

इतना दिल में दबा के रखोगे

तो हों जाएँगी मुसीबतें बड़ी

अब तो ये मौन व्रत तोड़ दो

कि आज होगी अंतिम सेहरी

ग़ज़ल

टक्कर हुई सड़क पे तो

दिल के वो तार हिल गए

दरिया में थे बुझे पड़े

कँवल वो सारे खिल गए

बदले जो रंग नूर के

ख़तों के सिलसिले चल गए

बदल गए मिज़ाजे मन

लहजे पूरे बदल गए

धड़कन में उनकी बस गए

वो दिल में ढल गए

Ghazal

लोग जो भी गुज़र जाएँ ठहर के देखें

गर दुनिया तुम्हें मेरी नज़र से देखे

जिस गली में भी बसा है आशियाँ तेरा

लोग राहें सब उसी डगर के देखें

तेरे वजूद से हैं ये रातें रौशन

रात अंधेरों को सहर कर के देखें

यू चाहत में दिए जाने की ज़िद में

सोचा अपनी लंबी उम्र कर के देखें

नूर में तेरे जब है दवाओं सा असर

क्यूँ वो रस्ते चारागर के देखें

सूरत से चल जाता है सीरत का पता

चाह बाक़ी तेरे दिल में उतर के देखें