ग़ज़ल

चली है झूमती पवन ज़रा चहक उठा है मन

ठहर लुभावनी घड़ी में धुन मैं गुनगुना तो लूँ

लो गा रही हैं कोयलें सुना रही नफ़्स नफस

लो सुर में सुर मिला के आज सुन मैं गुनगुना तो लूँ

है याद आ रहा कोई अब उसकी आरज़ू सजा

ये प्यास से भरे नयन को मुन मैं गुनगुना तो लूँ

मुझे तो लग गए हैं पंख छू लूँ ज़मीन आसमाँ

हज़ार से हसीन ख़्वाब बुन मैं गुनगुना तो लूँ

ये पल अगर गुज़र गया तो लौट कर न आएगा

अभी मिला मुझे जो पल को चुन मैं गुनगुना तो लूँ

ग़ज़ल

जो ख़त मोहब्बत के लिखे थे तुमने

अब भी महफ़ूज़ रखे हैं सिरहाने से

जब भी मिल जाती है मुझको चंद मोहलत

पढ लेती हूँ मैं उन्हें बहाने से

जो न पढ सकूँ तो लगा लेती हूँ अंदाज

लब्ज जो मिट चुके हैं आँसुओं के पानी से

तेरे ख़तों की क्या बात ये हैं नायाब

तब तीरे- नज़र जाके लगा निशाने पे

ये है मेरी बेचैन निगाहों का सबब

तुम नहीं आए फिर भी मेरे बुलाने से

ख़त जलाना है तो जला दूँ मेरी जाँ

निशाँ तेरे सब मिट जाएँगे ठिकाने से

अब तो नहीं मुझे रुसवाइयों का डर

कौन करता अब फ़िकर बेदर्द जमाने की

सीने में है यार-ए-दश्त-ए-तसव्वुर

हम तो जीते हैं ख़तों के बहाने से

तेरे-मेरे मिलने की नहीं क़िस्मत

हम चूकते नहीं क़िस्मत को आजमाने से

Ghazal

थी चाँदनी में शब धुली

था चाँद भी शबाब पर

महफ़िल सजी थी तारों की

धुंधले से आसमान पर

मेरी नज़र लगी रही

थी चाँद पर किताब पर

उनकी मचलती याद थी

इस जज़्बाए कलाम पर

यूँ टकटकी लगी रही

आई न नींद रात भर

कोई न ज़ोर चल सका

एहसासों के तूफ़ान पर

तुम्हें सुनाएँ हाले दिल

आके मिलो जो बाम पर

मंजरी ‘पुष्प’

Ghazal

तुम नहीं आसपास दीवारों दर का साथ

करें तो क्या करें हर्फ-ए-सुख़न बयाँ करें

कुछ लिख के फाड़ें फिर कुछ नया लिखा करें

दोस्तों को फिर बेधड़क लिखा सुनाया करें

साल के अंतिम पल में सालगिरह मुबारक

ऐसे में तोहफ़े में क्या बनवाया करें

मैं जन्म से कंगाल नहीं हीरे पोखराज

सोचा नज़्म तुमको अपनी सुनाया करें